संत श्री आसारामजी आश्रम

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किसी भी देश की सच्ची संपत्ति संतजन ही होते है। ये जिस समय आविर्भूत होते हैं, उस समय के जन-समुदाय के लिए उनका जीवन ही सच्चा पथ-प्रदर्शक होता है। एक प्रसिद्ध संत तो यहाँ तक कहते हैं कि भगवान के दर्शन से भी अधिक लाभ भगवान के चरित्र सुनने से मिलता है और भगवान के चरित्र सुनने से भी ज्यादा लाभ सच्चे संतों के जीवन–चरित्र पढ़ने–सुनने से मिलता है। वस्तुतः विश्व के कल्याण के लिए जिस समय जिस धर्म की आवश्यकता होती है, उसका आदर्श उपस्थित करने के लिए भगवान ही तत्कालीन संतों के रूप में नित्य-अवतार लेकर आविर्भूत होते है। वर्तमान युग में यह दैवी कार्य जिन संतों द्वारा हो रहा है, उनमें एक लोकलाडले संत हैं अहमदाबाद के श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ योगीराज पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू |

आश्रम स्थापना[सम्पादन]

साबरमती नदी के किनारे की उबड़-खाबड़ टेकरियो (मिटटी के टीलों) पर भक्तों द्वारा आश्रम के रूप में दिनांक :29 जनवरी 1972 को एक कच्ची कुटिया तैयार की गयी। इस स्थान के चारों ओर कंटीली झाड़ियों व बीहड़ जंगल था, जहाँ दिन में भी आने पर लोगों को चोर-डाकुओं का भय बराबर बना रहता था। लेकिन आश्रम की स्थापना के बाद यहाँ का भयानक और दूषित वातावरण एकदम बदल गया। आज इस आश्रमरूपी विशाल वृक्ष की शाखाएँ भारत ही नहीं, विश्व के अनेक देशों तक पहुँच चुकी है। साबरमती के बीहड़ों में स्थापित यह कुटिया आज ‘संत श्री आसारामजी आश्रम’ के नाम से एक महान पवित्र धाम बन चुकी है। इस ज्ञान की प्याऊ में आज लाखों की संख्या में आकर हर जाति, धर्म व देश के लोग ध्यान और सत्संग का अमृत पीते है तथा अपने जीवन की दुःखद गुत्थियाँ को सुलझाकर धन्य हो जाते है।

आश्रम द्वारा संचालित सत्प्रवृत्तियाँ[सम्पादन]

आदिवासी विकास की दिशा में कदम[सम्पादन]

संत श्री आसारामजी आश्रम एवं इसकी सहयोगी संस्था श्री योग वेदांत सेवा समिति द्वारा वर्षभर गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उड़ीसा आदि प्रान्तों के आदिवासी क्षेत्रों में पहुँचकर संतश्री के सानिधय में निर्धन तथा विकास की धारा से वंचित जीवन गुजारनेवाले वनवासियों को अनाज, वस्त्र, कम्बल, प्रसाद, दक्षिणा आदि वितरित किया जाता है तथा व्यवसनों एवं कुप्रथाओं से सदैव बचे रहने के लिए विभिन्न आध्यात्मिक एवं यौगिक प्रयोग उन्हें सिखलायें जाते हैं।

व्यवसनमुक्ति की दिशा में कदम[सम्पादन]

साधारणतया लोग सुख पाने के लिये व्यवसनों के चुँगल में फ़ँसते हैं। पूज्यश्री उन्हें केवल निषेधात्मक उपदेशों के द्वारा ही नहीं अपितु शक्तिपात वर्षा के द्वारा आंतरिक निर्विषय सुख की अनुभूति करने में समर्थ बना देते है, तब उनके व्यसन स्वतः ही छूट जाते हैं।

सत्संग-कथा में भरी सभा में विषैले व्यवसनों के दुर्गुणों का वर्णन कर तथा उनसे होनेवाले नुकसानों पर प्रकाश डालकर पूज्यश्री लोगों को सावधान करते हैं। समाज में ‘नशे से सावधान’ नामक पुस्तिका के वितरण तथा अनेक अवसरों पर चित्र-प्रदर्शनियों के माधयम से जनमानस में व्यवसनों से शरीर पर होनेवाले दुष्प्रभाओं का प्रचार कर विशाल रूप से व्यवसनमुक्ति अभियान संचालित किया जा रहा है। युवाओं में व्यवसनों के बढ़ते प्रचलन को रोकने की दिशा में संत श्री आसारामजी महाराज, स्वयं उनके पुत्र भी नारायण स्वामी तथा बापूजी के हजारों शिष्य सतत प्रयत्नशील होकर विभिन्न उपचारों एवं उपायों से अब तक असंख्य लोगों को लाभान्वित कर चुके हैं।

संस्कृति के प्रचार की दिशा में कदम[सम्पादन]

भारतीय संस्कृति को विश्वव्यापी बनाने के लिये संतश्री केवल भारत के ही गाँव-गाँव और शहर-शहर ही नहीं घुमते हैं अपितु विदेशों में भी पहुँचकर भारत के सनातनी ज्ञान की संगमित अपनी अनुभव-सम्पन्न योगवाणी से वहाँ के निवासियों में एक नई शांति, आनंद व प्रसन्नता का संचार करते हैं। इतना ही नहीं, विभिन्न आश्रम एवं समितियों के साधकगण भी आडियो-विडियो कैसेटों के माधयम से सत्संग व संस्कृति का प्रचार-प्रसार करते रहते हैं।

कुप्रथा-उन्मूलन कार्यक्रम[सम्पादन]

विशेषकर समाज के पिछड़े वर्गों में व्याप्त कुप्रथाओं तथा अज्ञानता के कारण धर्म के नाम पर तथा भूत-प्रेत, बाधा आदि का भय दिखाकर उनकी सम्पत्ति का शोषण व चरित्र का हनन अधिकांश स्थानों पर हो रहा है। संतश्री के आश्रम के साधकों द्वारा तथा श्री योग वेदांत सेवा समिति के सक्रिय सदस्यों द्वारा समय-समय पर सामूहिक रूप से ऐसे शोषणकारी षड़यंत्रों से बचे रहने का तथा कुप्रथाओं के त्याग का आह्वान किया जाता हैं।

असहाय-निर्धन-रोगी-सहायता अभियान[सम्पादन]

विभिन्न प्रांतों में निराश्रित, निर्धन तथा बेसहारा किस्म के रोगियों को आश्रम तथा समितियों द्वारा चिकित्सालयों में निःशुल्क दवाई, भोजन, फ़ल आदि वितरित किए जाते हैं।

प्राकृतिक प्रकोप में सहायता[सम्पादन]

भूकम्प हो, प्लेग हो अथवा अन्य किसी प्रकार की महामारी, आश्रम से साधकगण प्रभावित क्षेत्रों में पहुँचकर पीड़ितों को तन-मन-धन से आवश्यक सहायता-सामग्री वितरित करते हैं। ऐसे क्षेत्रों में आश्रम द्वारा अनाज, वस्त्र, औषधि एवं फ़ल-वितरण हेतु शिविर भी आयोजित किया जाता हैं। प्रभावित क्षेत्रों में वातावरण की शुद्वता के लिए धूप भी किया जाता हैं।

सत्साहित्य एवं मासिक पत्रिका प्रकाशन[सम्पादन]

संत श्री आसारामजी आश्रम द्वारा भारत की विभिन्न भाषाओं एवं अंग्रेजी में मिलाकर अब तक 180 पुस्तकों का प्रकाशन कार्य पूर्ण हो चुका हैं। यही नहीं, हिन्दी एवं गुजराती भाषा में आश्रम से नियमित मासिक पत्रिका ‘ॠषि प्रसाद’ का भी प्रकाशन होता है, जिसके लाखों – लाखों पाठक हैं। देश –विदेश का वैचारिक प्रदूषण मिटाने में आश्रम का यह सस्ता साहित्य अत्यधिक सहायक सिद्व हुआ हैं। इसकी सहायता से अब तक आध्यात्मिक क्षेत्र में लाखों लोग प्रगति के पथ पर आरूढ़ हो चुके हैं।

विद्यार्थी व्यक्तित्व विकास शिविर[सम्पादन]

आनेवाले कल के भारत की दिशाहीन बनी इस पीढ़ी को संतश्री भारतीय संस्कृति की गरिमा समझाकर जीवन के वास्तविक उद्वेश्य की ओर गतिमान करते हैं। विद्यार्थी शिविरों में विद्वार्थियों को ओजस्वी-तेजस्वी बनाने तथा उनके सर्वांगीण विकास के लिए ध्यान की विविध द्वारा विद्वार्थियों की सुषुप्त शक्तियों को जागृत कर समाज में व्याप्त व्यवसनों एवं बुराइयों से छूटने के सरल प्रयोग भी विद्वार्थी शिविरों में कराये जाते हैं। इसके अतिरिक्त विद्यार्थियों में स्मरणशक्ति तथा एकाग्रता के विकास हेतु विशेष प्रयोग करवाये जाते हैं।

ध्यान योग शिविर[सम्पादन]

वर्ष भर में विविध पर्वों पर वेदान्त शक्तिपात साधना एवं ध्यान योग शिविरों का आयोजन किया जाता है, जिसमें भारत के चारों ओर से ही नहीं, विदेशों से भी अनेक वैज्ञानिक, डॉक्टर, इन्जीनियर आदि भाग लेने उमड़ पड़ते हैं। आश्रम के सुरम्य प्राकृतिक वातावरण में पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू का सान्निध्य पाकर हजारों साधक भाई-बहन अपने व्यावहारिक जगत को भूलकर ईश्वरीय आनन्द में तल्लीन हो जाते हैं। बड़े-बड़े तपस्वियों के लिए भी जो दुर्लभ एवं कष्टसाध्य है, ऐसे दिव्य अनुभव पूज्य बापू के शक्तिपात द्वारा प्राप्त होने लगते हैं।

निःशुल्क छाछ वितरण[सम्पादन]

भारत भर की विभिन्न समितियाँ निःशुल्क छाछ वितरण केन्द्रों का भी नियमित संचालन करती हैं तथा ग्रीष्म ॠतु में अनेक स्थानों पर शीतल जल की प्याऊ भी संचालित की जाती है।

गौशाला संचालन[सम्पादन]

विभिन्न आश्रमों में ईश्वरीय मार्ग में कदम रखनेवाले साधकों की सेवा में दूध, दही, छाछ, मक्खन, घी आदि देकर गौमाताएँ भी आश्रम की गौशाला में रहकर अपने भवबंधन काटती हुई उत्क्रांति की परम्परामें शीघ्र गति से उन्नत होकर अपन जीवन धन्य बना रही हैं। आश्रम के साधक इन गौमाताओं की मातृवत् देखभाल एवं चाकरी करते हैं।

आयुर्वेदिक औषधालय व औषध निर्माण[सम्पादन]

संतश्री के आश्रम में चलने वाले आयुर्वेदिक औषधियों से अब तक लाखों लोग लाभान्वित हो चुके हैं। संतश्री के मार्गदर्शन में आयुर्वेद के निष्णात वेदों द्वारा रोगियों का कुशल उपचार किया जाता हैं। अनेक बार तो अमदावाद व मुंबई के प्रख्यात चिकित्सायलों में गहन चिकित्सा प्रणाली से गुजरने के बाद भी अस्वस्थता यथावत् बनी रहने के कारण रोगी को घर के लिए रवाना कर दिया जाता हैं। वे ही रोगी मरणासन्न स्थिति में भी आश्रम के उपचार एवं संतश्री के आशीर्वाद से स्वस्थ व तंदुरूस्त होकर घर लौटते हैं। साधकों द्वारा जड़ी-बूटियों की खोज करके सूरत आश्रम में विविध आयुर्वेदिक औषधियों का निर्माण किया जाता हैं।

मौन-मंदिर[सम्पादन]

तीव्र साधना की उत्कंठावाले साधकों को साधना के दिव्य मार्ग में गति करने में आश्रम के मौन-मंदिर अत्यधिक सहायक सिद्ध हो रहे हैं। साधना के दिव्य परमाणुओं से घनीभूत इन मौन-मंदिरों में अनेक प्रकार के आध्यात्मिक अनुभव होने लगते हैं, जिज्ञासु को षटसम्पत्ति की प्राप्ति होती हैं तथा उसकी मुमुक्षा प्रबल होती हैं। एक सप्ताह तक वह किसी को नहीं देख सकता तथा उसको भी कोई देख नहीं सकता| भोजन आदि उसे भीतर ही उपलब्ध करा दिया जाता हैं। समस्त विक्षेपों के बिना वह परमात्ममय बना रहता हैं। भीतर उसे अनेक प्राचीन संतों, इष्टदेव व गुरूदेव के दर्शन एवं संकेत मिलते हैं।

साधना सदन[सम्पादन]

आश्रम के साधना सदनों में देश-विदेश से अनेक लोग अपनी इच्छानुसार सप्ताह, दो सप्ताह, मास, दो मास अथवा चातुर्मास की साधना के लिये आते हैं तथा आश्रम के प्राकृतिक एकांतिक वातावरण का लाभ लेकर ईश्वरीय मस्ती व एकाग्रता से परमात्मस्वरूप का ध्यान – भजन करते हैं।

सत्संग समारोह[सम्पादन]

आज के अशांत युग में ईश्वर का नाम, उनका सुमिरन, भजन, कीर्तन व सत्संग ही तो एकमात्र ऐसा साधन है जो मानवता को जिन्दा रखे बैठा है और यदि आत्मा-परमात्मा को छूकर आती हुई वाणी में सत्संग मिले तो सोने पे सुहागा ही मानना चाहिये। श्री योग वेदांत सेवा समिति की शाखाएँ अपने-अपने क्षेत्रों में संतश्री के सुप्रवचनों का आयोजन कर लाखों की संख्या में आने वाले श्रोताओं को आत्मरस का पान करवाती हैं।

श्री योग वेदांत सेवा समितियों के द्वारा आयोजित संत श्री आसारामजी बापू के दिव्य सत्संग समारोह में अक्सर यह विशेषता देखने को मिलती है कि इतनी विशाल जन-सभा में ढ़ाई-ढ़ाई लाख श्रोता भी शांत व धीर-गंभीर होकर आपश्री के वचनामृतों का रसपान करते है तथा मंडप कितना भी विशाल भी क्यों नहीं बनाया गया हो, वह भक्तों की भीड़ के आगे छोटा पड़ ही जाता हैं। स्त्सन्ग में बदे बदे लोग अते हे ओर बापू जी का सत्सन्ग्सुन कर अपने आप को धन्य मनते हे। कैइ लोगो ने अप्ना जीवन ही बदल दाल।

नारी उत्थान कार्यक्रम[सम्पादन]

‘राष्ट्र को उन्नति के परमोच्च शिखर तक पहुँचाने के लिए सर्वप्रथम नारी-शक्ति का जागृत होना आवश्यक हैं…’ यह सोचकर इन दीर्घदृष्टा मनीषी ने साबरमती के तट पर ही अपने आश्रम से करीब आधा किलोमीटर की दूरी पर ‘नारी उत्थान केन्द्र’ के रूप में महिला आश्रम की स्थापना की।

महिला आश्रम में भारत के विभिन्न प्रांतों से एवं विदेशों से आयी हुई अनेक सन्नारियाँ सौहार्द्रपूर्वक जीवनयापन करती हुई आध्यात्मिक पद पर अग्रसर हो रही हैं।

साधना काल के दौरान विवाह के तुरंत ही बाद संतश्री आसारामजी महाराज अपने अंतिम लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार की सिद्दी के लिए गृहस्थी का मोहक जामा उतारकर अपने सदगुरूदेव के सान्निध्य में चले गये थे।

आपश्री की दी हुई आज्ञा एवं मार्गदर्शन के अनुरूप सर्वगुणसम्पन्न पतिव्रता श्रीश्री माँ लक्ष्मीदेवी ने अपने स्वामी की अनुपस्थिति में तपोनिष्ठ साधनामय जीवन बिताया | सांसारिक सुखों की आक्षांका छोड़कर अपने पतिदेव के आदर्शों पर चलते हुए आपने आध्यात्मिक साधना के रहस्यमय गहन मार्ग में पदापर्ण किया तथा साधना काल के दौरान जीवन को सेवा के द्वारा घिसकर चंदन की भांति सुवासित बनाया।

सौम्य, शांत, गंभीर वदनवाली पूजनीया माताजी महिला आश्रम में रहकर साधना मार्ग में साधिकाओं का उचित मार्गदर्शन करती हुई अपने पतिदेव के दैवी कार्यों में सहभागी बन रही हैं।

जहाँ एक ओर संसार की अन्य नारियाँ फ़ैशनपरस्ती एवं पश्चिम की तर्ज पर विषय-विकारों में अपना जीवन व्यर्थ गवाँ रही हैं, वहीं दूसरी ओर इस आश्रम की युवतियाँ संसार के समक्ष आकर्षणों को त्यागकर पूज्य माताजी की स्नेहमयी छत्रछाया में उनसे अनुष्ठान एवं आनंदित जीवनयापन कर रही हैं।

नारी के सम्पूर्ण शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिये महिला आश्रम में आसन, प्राणायाम, जप, ध्यान, कीर्तन, स्वाध्याय के साथ-साथ विभिन्न पर्वों, उत्सवों पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन होता है, जिसका संचालन संतश्री की सुपुत्री वंदनीया भारतीदेवी करती हैं।

ग्रीष्मावकाश में देशभर से सैकड़ों महिलाएँ एवं युवतियाँ महिला आश्रम में आती हैं, जहाँ उन्हें पूजनीया माताजी एवं वंदनीया भारतीदेवी द्वारा भावीजीवन को सँवारने, पढ़ाई में सफ़लता प्राप्त करने तथा जीवन में प्रेम, शांति, सद् भाव, परोपकारिता के गुणों की वृद्धि के संबंध में मार्गदर्शन प्रदान किया जाता हैं।

गृहस्थी में रहनेवाली महिलाएँ भी अपनी पीड़ाओं एवं गृहस्थ की जटिल समस्याओं के संबंध में पुजनीया माताजी से मार्गदर्शन प्राप्त कर स्वयं के तथा परिवार के जीवन को सँवारती हैं। वे अनेक बार यहाँ आती तो हैं रोती हुई और उदास, लेकिन जब यहाँ से लौटती हैं तो उनके मुखमंडल पर असीम शांति और अपार हर्ष की लहर छायी रहती हैं।

महिला आश्रम में निवास करनेवाली साध्वी बहनें भारत के विभिन्न शहरों एवं ग्रामों में जाकर संत श्री आसारामजी बापू द्वारा प्रदत्त ज्ञान एवं भारतीय संस्कृति के उच्चादर्शों एवं पावन संदेशों का प्रचार-प्रसार करती हुई भोली-भाली ग्रामीण नारियों में शिक्षा, व्यवसनमुक्ति, स्वास्थ्य, बच्चों के उचित पोषण करने, गृहस्थी के सफ़ल संचालन करने तथा नारीधर्म निबाहने की युक्तियाँ भी बताती हैं।

नारी उत्थान केन्द्र की अनुभवी साधवी बहनों द्वारा विद्यालयों में घूम-घूमकर स्मरणशक्ति के विकास एवं एकाग्रता के लिए प्राणायाम, योगासन, ध्यान आदि की शिक्षा दी जाती हैं। इन बहनों द्वारा विद्यार्थी जीवन में संयम के महत्व तथा व्यवसनमुक्ति से लाभ के विषय पर भी प्रकाश डाला जाता है।

संत श्री के मार्गदर्शन में महिला आश्रम द्वारा ‘धन्वन्तरि आरोग्य केन्द्र’ के नाम से एक आयुर्वेदिक औषधालय भी संचालित किया जाता है, जिसमें साध्वी वैद्दों द्वारा रोगियों का निःशुल्क उपचार किया जाता है। अनेक दीर्घकालीन एवं असाधय रोग यहाँ के कुछ दिनों के साधारण उपचारमात्र से ही ठीक हो जाते है। जिन रोगियों को एलोपैथी में एकमात्र आपरेशन ही उपचार के रूप में बतलाया गया था, ऐसे रोगी भी आश्रम की बहनों द्वारा किये गये आयुर्वेदिक उपचार से बिना आपरेशन के ही स्वस्थ हो गये।

इसके अतिरिक्त महिला आश्रम में संतकृपा चूर्ण, आँवला चूर्ण अवं रोगाणुनाशक धूप का निर्माण भी बहनें अपने ही हाथों से करती हैं। सत्साहित्य प्रकाशन के लिये संतश्री की अमृतवाणी का लिपिबद्व संकलन, पर्यावरण संतुलन के लिये वृक्षारोपण एवं कृषिकार्य तथा गौशाला का संचालन आश्रम की साध्वी बहनों द्वारा ही किया जाता है।

नारी किस प्रकार से अपनी आन्तरिक शक्तियों को जगाकर नारायणीं बन सकती है तथा अपनी संतानों एवं परिवार में सुसंस्कारों का चिंतन कर भारत का भविष्य उज्ज्वल कर सकती है, इसकी सुसंसकारों का चिंतन कर भारत का भविष्य उज्जवल कर सकती है, इसकी ॠषि-महर्षि प्रणीत प्राचीन प्रणाली को अमदावाद महिला आश्रम की साधवी बहनों द्वारा ‘बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय’ समाज में प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है।

महिलाओं को एकांत साधना के लिये नारी उत्थान आश्रम में मौन-मंदिर व साधना सदन आदि भी उपलब्ध कराये जाते हैं। इनमें अब तक देश-विदेश की हजारों बहनें साधना कर ईश्वरीय आनन्द और आन्तरिक शक्ति जागरण की दिव्यानुभूति प्राप्त कर चुकी हैं।

विद्यार्थियों के लिये सस्ती नोटबुक (उत्तरपुस्तिका)[सम्पादन]

संत श्री आसारामजी आश्रम, साबरमती, अहमदाबाद से प्रतिवर्ष स्कूलों एवं कालेजों के विद्यार्थियों के लिये प्रेरणादायी उत्तरपुस्तिकाओं (Note Books) का निर्माण किया जाता है।

इन उत्तरपुस्तिकाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि इसके प्रत्येक पेज पर संतों, महापुरुषों की तथा गाँधी व लालबहादुर जैसे ईमानदार नेताओं की पुरूषार्थ की ओर प्रेरित करनेवालि जीवनोद्वारक वाणी अंतिम पंक्ति में अंकित रहती है। इनकी दूसरी विशेषता यह है कि ये बाजार भाव से बहुत सस्ती होती ही हैं, साथ ही गुणवत्ता की दृष्टि से उत्कृष्ट, सुसज्ज एवं चित्ताकर्षक होती हैं।

विद्यार्थी जीवन में दिव्यता प्रकटाने में समर्थ संत श्री आसारामजी बापू के तेजस्वी संदेशों से सुसज्ज मुख्य पृष्ठोंवाली ये उत्तरपुस्तिकाएँ निर्धन बच्चों में यथास्थिति देखकर निःशुल्क अथवा आधे मूल्य पर अथवा आधे मूल्य पर अथवा रियायती दरों पर वितरित की जाती हैं, ताकि निर्धनता के कारण भारत का भविष्यरूपी कोई बालक अशिक्षित न रह जाय |

ये उत्तरपुस्तिकाएँ बाजार भाव से 15-20 रूपये प्रतिदर्जन सस्ती होती हैं। इसलिये भारत के चारों कोनों में स्थापित श्री योग वेदांत सेवा समितियों द्वारा प्रतिवर्ष समाज में हजारों नहीं, अपितु लाखों की संख्या में इन नोटबुकों का प्रचार-प्रसार किया जाता है।

संबंधित लेख[सम्पादन]

  • आसाराम
  • श्री योग वेदान्त सेवा समिति
  • श्री आसारामायण

बाहरी कड़ियाँ[सम्पादन]


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