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अमेरिका के हिन्दी कथाकार

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अमेरिका के प्रवासी हिन्दी साहित्य में जो तीन सबसे सशक्त हस्ताक्षर हैं और जिनके उल्लेख के बिना हिन्दी साहित्य का इतिहास पूरा नहीं होता, वे हैं - उषा प्रियंवदा, सुनीता जैन और सोमा वीरा। यो तीनों ही साठ के दशक में प्रकाश में आए और इन्होंने हिन्दी साहित्य को कई उल्लेखनीय कृतियाँ दीं। इनके लेखन में अमरीकी जीवन की झलक साफ़ दिखाई देती है। जीवन शैली की भिन्नता, सोच का वैभिन्न्य और भाषागत भिन्नता एक किस्म का "कल्चरल शॉक" देती रही। सांस्कृतिक मूल्यों की इस टकराहट की अनुगूँज इनके लेखन में स्पष्ट तौर पर सुनाई देती है। अपनी लेखनी से इस लेखिका त्रयी ने न केवल भारतीय साहित्य को समृद्ध किया वरन उसका परिचय एक ऐसे कथालोक से कराया जो इससे पहले हिन्दी साहित्य में अनजाना था।

अमेरिकी प्रवासी हिन्दी साहित्य की अवधारणा यहीं से शुरू हुई। सोमा वीरा आज इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन सुनीता जैन और उषा प्रियंवदा आज भी सक्रिय हैं और शायद ही कोई साहित्य प्रेमी होगा जिसने इन्हें न पढ़ा हो। इसी दशक में अमेरिका आए अन्य रचनाकार हैं, कमला दत्त, वेद प्रकाश बटुक और इन्दुकान्त शुक्ल। यह कहा जाता रहा है कि उषा प्रियंवदा, इन्दुकान्त शुक्ल और बाद के वर्षों में उमेश अग्निहोत्री, अनिल प्रभा कुमार आदि अमेरिका आने से पहले ही लेखक रूप में अपनी पहचान बना चुके थे किन्तु यह निर्विवाद सत्य है कि अमेरिका की पृष्ठभूमि न केवल उनके लेखन के लिए उर्वर सिद्ध हुई वरन् अमेरिका प्रवास ने उन्हें एक बृह्त्तर फ़लक दिया जिस पर उनके रचनाकार की कालजयी या महत्वपूर्ण पहचान बनी या बन रही है।

बाद के वर्षों में बड़ी संख्या में भारतीयों ने अमेरिका प्रस्थान किया - जिसे पलायन की संज्ञा भी दी गई किन्तु साहित्य की दृष्टि से यह स्थिति बहुत ही सुखद रही। इन प्रवासी भारतीयों के बीच से कथा लेखन के क्षेत्र में भी कई हस्ताक्षर सामने आए। सत्तर और अस्सी के दशक में सुदर्शन प्रियदर्शिनी, अनिल प्रभा कुमार, मधु माहेश्वरी, उषा देवी विजय कोल्हट्कर, स्व. रामेश्वर अशान्त, कमलेश कपूर, श्याम नारायण शुक्ल, पूर्णिमा गुप्ता, सीमा खुराना, रेणु राजवंशी गुप्ता, विशाखा ठाकुर, सुरेश राय, सुधा ओम ढींगरा, मिश्रीलाल जैन, शालीग्राम शुक्ल, रचना रम्या, रेखा रस्तोगी, स्वदेश राणा, नरेन्द्र कुमार सिन्हा, अशोक कुमार सिन्हा, अनुराधा चन्दर, डॉ॰आर. डी. एस "माहताब",ललित अहलूवालिया, आर्य भूषण,डा भूदेव शर्मा, डा वेद प्रकाश सिंह "अरूण" और सुषम बेदी प्रकाश में आए।

सुषम बेदी वस्तुत: देखा जाय तो इन सारे नामों में फ़िलहाल लेखकों की अगली पीढ़ी का प्रतिनिधित्व सुषम बेदी कर रही हैं। उनके तमाम उपन्यासों में सर्वाधिक चर्चित "हवन" अमेरिकी पृष्ठ्भूमि पर ही लिखा गया है। उनके लेखन का फ़लक विस्तृत है और जीवन के तमाम पहलुओं पर उन्होंने लिखा है। उनकी कई कहानियाँ भी याद रह जाती हैं - यथा "सरस्वती की धार"," चिड़िया और चील", "दरबान" वगैरह।

रामेश्वर अशान्त

स्व. रामेश्वर अशान्त का योगदान इस अर्थ में अधिक उल्लेख्ननीय रहा कि उन्होंने अपनी पत्रिका के माध्यम से पहली बार अमेरिकी लेखकों को वह मंच प्रदान किया जिस के माध्यम से वे अपने आपको अभिव्यक्त कर सकते थे। बाद में कई पत्रिकाएँ प्रकाश में आई - वेब पत्रिकाएँ भी किन्तु इससे उनके योगदान की महत्ता कम नहीं होती बल्कि विडंबना यह रही कि अमेरिका की होने के बावजूद, इनमें से कुछ ने तो भारत के ही रचनाकारों पर ध्यान केन्द्रित कर रखा है और यहाँ के रचनाकारों को उनकी उपेक्षा ही मिली है।

उषा देवी कोल्हट्कर

उषा देवी कोल्हट्कर भी एक सशक्त और सुपरिचित प्रवासी हस्ताक्षर हैं जिन्होंने न केवल हिन्दी में वरन मराठी में भी खूब लिखा है और उल्लेखनीय लिखा है।

स्वदेश राणा इसी तरह स्वदेश राणा एक सशक्त लेखिका हैं और उनका नवीनतम उपन्यास "कोठेवाली " काफ़ी चर्चित रहा है।

वर्तमान में पूर्वलिखित रचनाकारों के सिवा कई अन्य लेखक/लेखिकाएँ हैं जो लगातार सृजनशील है, यथा - धनंजय कुमार, अमरेन्द्र कुमार, प्रतिभा सक्सेना, अंशु जौहरी, इला प्रसाद, राजश्री शर्मा, कुसुम सिन्हा, ज्ञानेन्द्र सिंह, सौमित्र, सरोज अग्रवाल, अनुराधा चन्दर, वेद्प्रकाश सिंह अरुण, नीलम जैन, बबिता श्रीवास्तव, शकुन्तला बहादुर, देवी नांगरानी, कैलाशनाथ तिवारी आदि। इन तमाम रचनाकारों के एकाधिक कहानी संग्रह /उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं या प्रकाशनाधीन हैं। "वर्तमान साहित्य" "और रचना-समय" के प्रवासी रचनाकार विशेषांकों में उपरोक्त वरिष्ठ लेखकों के साथ इनमें से कतिपय की रचनाएँ संकलित हैं। कहानियों के हिन्दी से इतर भाषाओं में अनुवाद भी हुए हैं और ऐसा कहा जा सकता है कि इन्होंने न केवल हिन्दी- पाठक समुदाय का वरन भारत के लेखक-समुदाय का भी ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया है।

समालोचना[सम्पादन | स्रोत सम्पादित करें]

यदि इन तमाम लेखकों के लेखन पर एक विहंगम दृष्टि डालें तो जो बातें सामने आती हैं, उनमें मुख्य यह कि अमेरिका आने के पश्चात भी इन सबने भारत और भारतीय परिवेश की कहानियाँ लिखी हैं और लिख रहे हैं। उदाहरण के लिए, राजश्री की - जिनकी कहानियाँ मूलत स्त्री- पुरुष सम्बन्धों के इर्द-गिर्द घूमती हैं - "मैं बोनसाई नहीं", "मुक्ति और नियति", श्याम नारायण शुक्ल की "दीक्षा - समारोह", "कर्मफ़ल", ....कुसुम सिन्हा की "माँ", प्रतिभा सक्सेना की "फ़िर वह नहीं आई " अमरेंद्र कुमार की "ग्वासी" ऐसी ही कहानियाँ हैं। यह सहज स्वाभाविक भी है। क्या गाँवों से शहर को कूच कर गया लेखक आज भी गाँव की कहानी नहीं कह रहा ? जब हम अतीत का कॊई टुकड़ा अपने लिए, अपनी स्मृति में सुरक्षित करते हैं तो वह काल की सीमा से परे हो जाता है। अमेरिका में रह रहे भारतीय रचनाकारों की मानसिकता, जो उनके लेखन में प्रतिध्वनित होती है, का एक सच यह भी है। वक्त ठहर गया है। हम चाहे अरसे से अपने देश से बाहर हों, स्थितियाँ बदल चुकी हों, हमारी स्मृति में वह कालखंड सुरक्षित है और हम लौट- लौटकर उसकी कहानी कह रहे हैं। यह नास्टेलजिया, यहाँ बसे अधिकांश कहानीकारों की तमाम कहानियों में न भी हो तो कुछ कहानियों में अवश्य परिलक्षित होता है। न तो उसे नकारने की जरूरत है, न ही दुतकारने की। उसे सहज रूप से लिया जाना चाहिए क्योंकि यह उन तमाम प्रवासी भारतीयों के वजूद का हिस्सा है और वही अहसास उन्हें यहाँ संघर्ष करने का साहस भी देता है। यह भी सच है कि हममें से अधिकांश के लिए यह एक स्वेच्छा से अपनाया गया प्रवास है, चाहे अंतर्निहित कारण भिन्न-भिन्न हों और इसीलिए इस जीवन को छोड़ने के बजाय इसे पचाने की बेचैनी ज्यादा है।

यह बेचैनी अलग - अलग रूपों में यहाँ के रचनाकारों की रचनाओं में दिखाई देती है। कहीं वह सीधे- सीधे भारत को ही आधार बना कर यहाँ के परिवेश की कहानियाँ सुना रहा है। कभी पश्चिमी जीवन शैली, विवाहेतर सम्बन्ध, यौन हिन्सा, व्यवस्था और अतंर्निहित राजनीति, यहाँ बसे भारतीयों के अतंर्द्वदों, दो पीढ़ियों की टकराहट और मानवीय सरोकारों पर अपने विचार प्रगट करता दिखाई देता है (" सरोगेट मदर"- उषादेवी विजय कोल्हटकर, "तीन बेटों की माँ "- अनिल प्रभा कुमार,"भारत के वंशज" - उमेश अग्निहोत्री, "जमीला"- श्याम नारायण शुक्ल, "सड़क की लय "- सुषम बेदी, "कॉलेज" - इला प्रसाद आदि)।

पूर्व और पश्चिमी जीवन शैली में जो अन्तर है वह प्रवासी भारतीयों की पहली पीढ़ी के लिए गहरे अन्तर्द्वन्द की वजह रहा है। मूल्यों की टकराहट वहाँ साफ़ दिखाई देती है। जबकि भारतीयों की अगली पीढ़ी - जो यहाँ पैदा हुई और पली बढ़ी है, उसकी समस्या अलग है। कितना लेना है और कितना छोड़ना है, इसे लेकर संभ्रम की स्थिति है। पश्चिमी जीवन मूल्यों और भारतीय जीवन मूल्यों के बीच का आंकड़ा अधिकतर छ्तीस का है। भारत में जिसे आत्म- प्रदर्शन और आत्म- विज्ञापन की संज्ञा दी जाती है, वह अमेरिका में अपने आप को उद्घाटित करना कहलाता है। जीवन दर्शन का यह मूलभूत अन्तर ही यहाँ बस गई और यहाँ पैदा हुई दो पीढ़ियों के बीच का द्वंद्व है और बहुत सारे लेखन का मूल कथ्य भी।

एक बात जो ध्यान में रखने के योग्य है वह है लेखन की सार्थकता का। शिल्प की दॄष्टि से, भाषा की सरलता और सादगी या उसकी सुन्दरता, सम्प्रेषणीयता, कथ्य की सरलता/क्लिष्टता को लेकर सवाल उठाए गए हैं पहले भी और आगे भी उठाए जायेंगे। गुणवत्ता की विवेचना होगी। जब भी हिन्दी साहित्य की मूल धारा में अमेरिकी प्रवासी सहित्य का स्थान निश्चित करने की कोशिश होगी, ये सवाल खड़े होंगे। इसीलिए अमेरिकी प्रवासी लेखन में उस धार की आवश्यकता बनी रहेगी जो लेखन को, कृतियों को, कालजयी बनाती हैं। यह दुनिया की हर भाषा के साहित्य का सच है। कथाकारों की नई पौध को इस पहलू को ध्यान में रखकर चलना होगा यदि वे अपने पीछे एक लकीर छोड़ जाने की महत्वाकाँक्षा रखते हैं।


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