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सेन्रियु

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  रेंगा काल में [हाइकु] के वज़न का "हाइकाइ" शब्द हास्य व्यंग्य की रचनाओं के लिए प्रयुक्त हुआ, ठीक इसी तरह "हाइकु" के वज़न का "सेन्रियु" [१] शब्द प्रयुक्त हुआ है । इन चारों में वर्ण, शिल्प, पदशिल्प, पदाक्षर क्रम एक हैं किंतु कथ्य, भाव-बोध एवं वस्तुबोध संबंधी सामान्य अंतर है और भविष्य में भी रहेगा । [१] हाइकु की प्रतिक्रिया स्वरुप सेन्रियु की रचना प्रारंभ हुई- हास्य और व्यंग्य सेन्रियु का आधार है । धर्म, आस्था, अंधविश्वास को सेन्रियु मनुष्य की दुर्बलता मानता है और व्यंग्य द्वारा उन पर तीखा प्रहार करता है । [२] हाइकु "हाइकु" है और सेन्रियु [२] Senryu "प्रतिहाइकु" है । 
   सेन्रियु केवल मानव प्रकृति या भावनाओं के कुछ पहलू का संदर्भ देता है। उसके पास प्राकृतिक दुनिया के लिए कोई संदर्भ नहीं है । इस तरह सेन्रियु "प्रकृति या मौसमी हाइकु से बिल्कुल अलग है । "सेन्रियु को बाशो की अति आध्यात्मिकता की प्रतिक्रिया भी माना जाता रहा है ।" [३]
   हिन्दी के प्रतिष्ठित हाइकुकार डॉ. सतीशराज पुष्करणा जी का मानना है कि- 'हाइकु' हो या 'सेन्रियु' दोनों का अपना-अपना महत्व है । शैल्पिक दृष्टि से देखें तो दोनों एक ही हैं । दोनों में ही तीन पंक्तियों में क्रमशः 5-7-5 अक्षर होते हैं । किन्तु विषय दोनों विधाओं में पार्थक्य स्थापित करता है । दोनों विधाओं की भिन्न-भिन्न भूमिकाएँ होते हुए भी दोनों अपने आप में महत्वपूर्ण हैं ।
   'सेन्रियु' का विषय-फलक असीम है । यह अपने समय के सच को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करता है । यह साहित्य की किसी भी विधा की पहली शर्त है । [४]
     हाइकु कवयित्री डॉ. सुधा गुप्ता जी का स्पष्ट मत है कि- "हिन्दी हाइकु जगत के सैकड़ों हाइकुकार इस भेद को नहीं मानते किंतु यहाँ यह विवाद का विषय नहीं है । मेरी स्पष्ट धारणा और अभिमत है कि हाइकु और सेर्न्यू में केवल शारीरिक रचना (5-7-5) का साम्य है शेष सर्वथा भिन्न । हाइकु प्रकृति, प्रेम और अध्यात्म की वह रचना है जो प्राणों के पंख खोलती है पाठक को एक उदात्त धरातल पर ले जाती है जबकि सेर्न्यू कुछ हँसोड़ प्रकृति के रचनाकारों ने व्यंग्य, तंज, राजनीतिक, सामाजिक एवं पारिवारिक घटनाओं पर आक्रामक प्रहार करते हुए जो रचनाएँ की वे सेर्न्यू कहलायीं । सेर्न्यू का धरातल पूर्णतः पार्थिव है । अतः दोनों का पार्थक्य स्पष्ट है ।" [५]
     हिन्दी में वर्ष- 2003 से निम्नानुसार कुछ स्वतंत्र सेन्रियु संग्रह प्रकाशित हुए हैं -

सेन्रियु संग्रह[सम्पादन]

01. रूढ़ियों का आकाश (रचनाकार : प्रदीप कुमार दाश "दीपक") प्रकाशन वर्ष- 2003 [३]

02. सुर नहीं सुरीले (रचनाकार : सिद्धेश्वर) प्रकाशन वर्ष- 2004

03. जागरण के स्वर (रचनाकार : सिद्धेश्वर) प्रकाशन वर्ष- 2004

04. पानी मांगता देश (हाइकु कवयित्री : सुधा गुप्ता) प्रकाशन वर्ष- 2006

05. दौड़-दौड़ हिरना (हाइकु कवयित्री : सुधा गुप्ता) प्रकाशन वर्ष- 2017

संदर्भ[सम्पादन]

This article "सेन्रियु" is from Wikipedia. The list of its authors can be seen in its historical and/or the page Edithistory:सेन्रियु.

  1. रूढ़ियों का आकाश (सेन्रियु संग्रह) माण्डवी प्रकाशन गाजियावाद, प्रकाशन वर्ष- 2003, पृ.क्र. 07
  2. हिन्दी हाइकु, ताँका, सेदोका की विकास-यात्रा : एक परिशीलन - डाॅ सुधा. गुप्ता, अयन प्रकाशन, नई दिल्ली, ISBN 978-81-7408-638-9, पृ.क्र. 92, प्रकाशन वर्ष- 2017
  3. जापानी हाइकु और आधुनिक हिन्दी कविता (शोध-प्रबंध : प्रो। सत्यभूषण वर्मा) डायमंड पब्लिकेशन नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष-1983, पृ.क्र. 62
  4. पानी मांगता देश, (सेन्रियु संग्रह) पुष्करणा ट्रेडर्स, महेन्द्रू, पटना (बिहार) प्रकाशन वर्ष- 2006 (फ्लैप से उद्धृत)
  5. दौड़-दौड़ हिरना (सेन्रियु संग्रह), प्रकाशन वर्ष- 2017, निरुपमा प्रकाशन, शास्त्री नगर, मेरठ (उ.प्र.) ISBN 978-93-81050-78-1


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